truth difficult 2 accept

"PEN" is not for sale..................

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neerajtomer


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दशरथ माँझी

Posted On: 20 Nov, 2015  
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पीके

Posted On: 10 May, 2015  
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अब न्याय नहीं प्रतिशोध चाहिए

Posted On: 28 Dec, 2012  
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बेटी बचाओ अभियान में जोड़ें एक नया अध्याय

Posted On: 27 Aug, 2012  
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लील गये दर्शक, ‘पाठक’

Posted On: 10 May, 2012  
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ना कोंसो अब हमें

Posted On: 26 Apr, 2012  
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मँहगाई डायन बच्चे खात है………

Posted On: 12 Feb, 2012  
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पचपन और बचपन

Posted On: 5 Feb, 2012  
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Why this slavery?

Posted On: 9 Dec, 2011  
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परतंत्र शिक्षातंत्र

Posted On: 27 Nov, 2011  
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8 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

पर उलझन यह है कि कोठे पर बैठी तवायफ कहती है कि मैं पेट के लिए ज़िस्म बेचती हूँ, खरीदने वाले हैं इसलिए बिकती हूँ। मेरी मजबूरी ने मुझे कुलटा बना दिया पर वो शरीफ़ कैसे जिनके शौक ने मुझे यहाँ पहुँचा दिया? तो क्या वास्तव में हम पाठक समाचार-पत्रों को यह दिशा प्रदान कर रहे हैं? या समाचार-पत्रों ने नग्नता रूपी चरस की लत से पाठकों को दर्शक बना दिया! निश्चित परिणाम निकालना अत्यन्त कठिन है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि दोनांे ही कारण सामाजिक विकृति को बढ़वा अवश्य दे रहे हैं। पत्रकारिता का ये कैसा रूप है , समझ नहीं आता ? ये सब पहले अंग्रेजी अख़बारों तक ही सीमित था लेकिन अब हिंदी के अखबार भी यही सब छाप रहे हैं ! बढ़िया लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

के द्वारा: RAJEEV KUMAR JHA RAJEEV KUMAR JHA

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

वैसे यह गाना मुन्नी,शीला,जलेबी बाई आदि कई सारे महान लोकप्रिय गानों के सामने अश्लीलता की कसौटी में कही भी खड़ा नहीं होता...हाँ,इस गाने के बोल अन्य दुसरे गानों की तरह भौंडे नहीं हैं,और न ही इसका फिल्मांकन अधनंगी गौरंगनाओं को केंद्र में रख कर किया गया है,इस गाने की कमी केवल इतनी है की इसके बोल अजीब हैं,लेकिन अभद्र नहीं है...मुझे तो ये गाना कई सारे आधुनिक लोकप्रिय गानों से बेहतर लगता है.क्या इस गाने की खता इतनी ही है कि अभद्र शब्दों और शारीरिक संकेतों के अभाव में भी इस युग में इतना लोकप्रिय कैसे हो गया?या कर्णप्रिय नहीं है,लेकिन इसे पूरे परिवार के साथ बैठकर देखने,सुनने में आँखें शर्म से झुकती भी तो नहीं हैं.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

मैं आपकी भावनाओ का सम्मान करती हु सर. शिवाजी ने नया रूप अवश्य धारण किया था परन्तु स्वाम की रक्षा हेतु महिलाओ के आँचल का सहारा नहीं लिया था और न ही अपने विरुद्ध हुए किसी भी दुर्व्यवहार के लिए मगरमच्छ के आंसू बहाए थे . जहाँ तक धन संग्रह की बात है तो हमारे शास्त्रों में धन संग्रह को मान्यता प्राप्त नहीं है . जन साधारण को दीखने के लिए जमीन पर सोना फल आहार क रूप में लेना , परन्तु धन सम्पदा के अकूत भंडार का स्वामी होना, यह विरोधाभास रामदेव को संदिग्ध बनाते है. निसंदेह वर्तमान परिस्तिथियाँ जंग लड़ने के लिए धन की मांग करती है परन्तु ये जंग अभी शुरू हुई है और संपत्ति का यह संग्रह वर्षो पुरानी तपस्या का परिणाम है. साथ ही संघर्ष के लिए आवयाश्यक धन की मात्रा और इस भंडार की तुलना दोनों की भिन्नता को स्पस्ट करता है. एक और बात राम देव ने आम जनता को ताकत बनाकर ये आन्दोलन प्रारम्भ किया था तो धन का प्रबध भी आं जनता से आन्दोलन क मध्यान हो सकता था. वास्तव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने क आन्दोलन करने वाले ही स्वयं को पाक साफ सिद्ध करने में असमर्थ है .

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

नीरज जी ,…नमस्कार ,…………आपके कुछ विचार अच्छे हैं ,लेकिन एकपक्षीय हैं ,….. लिखने से पहले आपको कुछ तथ्यों पर जरूर विचार करना चाहिए था ,……….. अन्ना जी जनलोकपाल के लिए लड़ रहे हैं और रामदेव जी व्यवस्था परिवर्तन के लिए ,……अन्ना जी के कथनानुसार ,..”यदि गांधीगिरी से काम ना हुआ तो हमें शिवाजी बनाना होगा ” तो क्या शिवाजी ने बचने के लिए कई बार अपना भेष नहीं बदला ? रही बात धन इकठ्ठा करने की तो क्या बिना धन के कोई लड़ाई लड़ी जा सकती है ,…. आप यह क्यों भूल रही हैं कि रामदेव जी जमीन पर सोते हैं , फलाहार पर आश्रित हैं ,… ……….तो क्या हम भ्रष्टाचार ख़तम करने के लिए भगवान् के अवतार की प्रतीक्षा करेंगे ,…………शुभकामनाओं सहित

के द्वारा:

नीरज जी ,...नमस्कार ,............आपके कुछ विचार अच्छे हैं ,लेकिन एकपक्षीय हैं ,..... लिखने से पहले आपको कुछ तथ्यों पर जरूर विचार करना चाहिए था ,........... अन्ना जी जनलोकपाल के लिए लड़ रहे हैं और रामदेव जी व्यवस्था परिवर्तन के लिए ,......अन्ना जी के कथनानुसार ,.."यदि गांधीगिरी से काम ना हुआ तो हमें शिवाजी बनाना होगा " तो क्या शिवाजी ने बचने के लिए कई बार अपना भेष नहीं बदला ? रही बात धन इकठ्ठा करने की तो क्या बिना धन के कोई लड़ाई लड़ी जा सकती है ,.... आप यह क्यों भूल रही हैं कि रामदेव जी जमीन पर सोते हैं , फलाहार पर आश्रित हैं ,... अन्नाजी की टीम कोई महात्माओं की टीम नहीं है , वहां भगवा भेषधारी दलाल भी हैं और अपने फायदे के लिए अदालतों को प्रभावित करने वाले अरबपति वकील भी ,..........तो क्या हम भ्रष्टाचार ख़तम करने के लिए भगवान् के अवतार की प्रतीक्षा करेंगे ,............शुभकामनाओं सहित , संतोष कुमार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

शक्ति जी, तमन्ना जी व मुनीश जी आपके प्रतिक्रिया व सुझावों के लिए सर्वप्रथम तो मैं आपको धन्यवाद देती हूँ। दरअसल इस कहानी (आपके अनुसार लेख) को लिखते समय मेरी भावना उस व्यथा से समाज के प्रत्येक वर्ग को झकझोरना था जिनके लिए बेटियों के जीवन का कोई मोल नही। इस कहानी के माध्यम से मेरा उद्देश्य मात्र समस्या से परिचित कराना है, कोई सुझाव या समाधान मैं प्रस्तुत करना नहीं चाहती। यदि यह कहानी समाज के उस निदर्यी वर्ग के हृदय में तनिक भी संवेदनाएँ उत्पन्न कर पायी तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगी। इस कहानी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र दैनिक जागरण में प्रकाशित होने के पश्चात् प्राप्त प्रतिक्रियाओं मेरी साहस को दृढ़ता प्रदान की। कहानी के प्रति आपके सुझावों को सदा अपनी स्मृति में रखते हुए भविष्य में किसी प्रकार की त्रुटि न हो, इस बात का मैं ध्यान रखूंगी। भविष्य में आपकी सुझावों के लिए आशातीत रहूँगी। एक बार फिर आप सभी का धन्यवाद।

के द्वारा: neerajtomer neerajtomer

नीरज जी, भारत में १००० लड़कों पर ९२७ लड़कियां हैं और ये आकड़ा चिंताजनक भी है, लेकिन वास्तव में ये कमी केवल भ्रूण हत्या के कारण ही नहीं है..... बल्कि प्राकर्तिक रूप से भी लड़कियों की जन्मदर में कमी आई है ये रिपोर्ट यूनिसेफ ने दी है भारत की तरह ही चीन सहित सम्पूर्ण एशिया अफ्रीका महादीप के कुछ देशों और दक्षिणी अमेरिका के कुछ देशों में भी स्थिति यही है जबकि उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देशों में पुरूषों की संख्या स्त्रियों से कम है....... आपके लेख को पढ़कर ऐसा लगा की आप दो लेखों को जोड़कर एक लिख गयीं हैं या दो दो विषय एक ही लेख में लिखने की कोशिश की है....... आपने एक सार्थक विषय को उठाया है हालांकि नारियों के उत्पीडन पर स्वयं नारियां उतनी ही जिम्मेदार हैं जितने की पुरूष.......... लगता है इस मामले में भी नारियां पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चलना चाहती हैं........

के द्वारा:

आपकी चिन्ता बिल्कुल उचित है । प्रत्येक अभिभावक को इस बारे में सोचना चाहिये । वे  हमारी महत्वाकांक्षाओं का शिकार बन रहे हैं । जिस उम्र में उन्हें दोस्तों-मित्रों के साथ  उन्मुक्त होकर खेलना चाहिये, उस उम्र मां वे दस किलो बस्ते का बोझ उठाये स्कूल जाते हैं । स्कूल से घर आकर होमवर्क करने में लग जाते हैं । उनके प्राकृतिक रूप से होने वाले शारीरिक और मानसिक विकास का मार्ग अवरूद्ध रहता है । न आप उन्हें समय देहे हैं न उन्हें छोड़ते हैं । नतीजा, उनमें एक कुंठा सी भर जाती है। और यहीं कुंठा जब विस्फोटक रूप लेती है तो अनेक दुखदाई नतीजे होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर एक निरंकुश व्यक्तित्व होता है। समय-समय पर उस  निरंकुश व्यक्तित्व का उफान भी बाहर आना चाहिये। क्रिकेट मैच के मैदान मां आपने देखा होगा, शालीन से शालीन व्यक्ति भी  उमंग में चीखता-चिल्लाता है, जो सामान्य अवस्था में वह कभा नहीं कर सकता। तो बच्चे को भी ऐसा अवसर देना चाहिये। इससे उसे हल्कापन महसूस होगा तथा मानसिक और शारीरिक बदलाव आयेगा ।            --- bhushanshashi43@yahoo.com

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